Tulsi Vivah 2025: तिथि, मुहूर्त, कथा और पूजा विधि
Tulsi Vivah 2025: तुलसी विवाह 2025 में भगवान विष्णु और माता तुलसी का पवित्र मिलन मनाया जाएगा। यह शुभ दिन विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर कर सुख, समृद्धि और वैवाहिक जीवन में सौभाग्य लाता है। इस वर्ष तुलसी विवाह 3 नवम्बर 2025, सोमवार को मनाया जाएगा।

हिन्दू धर्म में तुलसी विवाह का अत्यंत विशेष महत्व है। इस दिन माता तुलसी (शालिग्राम जी की अर्धांगिनी) का विवाह भगवान विष्णु से किया जाता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह से मानव जीवन में विवाह-संबंधी बाधाएं दूर होती हैं, और गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह विवाह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे देवउठनी एकादशी या प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है।
तुलसी विवाह 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त (Tulsi Vivah 2025 Date & Muhurat)
तिथि: सोमवार, 3 नवम्बर 2025
तिथि आरंभ: 2 नवम्बर 2025, रात 11:15 बजे
तिथि समाप्त: 3 नवम्बर 2025, रात 9:50 बजे
विवाह मुहूर्त: प्रातः 8:00 बजे से लेकर दोपहर 12:30 बजे तक अत्यंत शुभ माना गया है।
तुलसी विवाह का महत्व (Significance of Tulsi Vivah)
यह पर्व संपूर्ण देवताओं के जागरण का प्रतीक है, क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं।
तुलसी विवाह करने से विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती हैं।
जो महिलाएँ उत्तम वर की कामना करती हैं या जिनके वैवाहिक जीवन में समस्या है, उन्हें यह व्रत विशेष फलदायक होता है।
यह विवाह स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उपस्थिति में माना जाता है।
तुलसी विवाह की विस्तृत कथा (Tulsi Vivah Katha in Detail)
बहुत प्राचीन समय की बात है — धर्मात्मा असुरराज जालंधर का जन्म समुद्र मंथन के समय हुआ था। वह अत्यंत पराक्रमी और भगवान शिव का भक्त था। उसकी पत्नी वृंदा (या तुलसी) भी परम पतिव्रता और भगवान विष्णु की महान भक्त थीं। वृंदा की पतिव्रता शक्ति के कारण ही जालंधर अजेय बन गया था — जब तक वृंदा अपने पति की पवित्रता और निष्ठा बनाए रखतीं, तब तक कोई भी देवता जालंधर को पराजित नहीं कर सकता था।
देवता जालंधर की शक्ति से भयभीत हो गए। उन्होंने भगवान शिव और विष्णु से सहायता मांगी। भगवान शिव ने जालंधर से युद्ध किया, परंतु वृंदा की पतिव्रता शक्ति के प्रभाव से शिव भी उसे नहीं हरा पाए। तब भगवान विष्णु ने एक योजना बनाई। उन्होंने जालंधर का रूप धारण किया और वृंदा के सामने प्रकट हुए। वृंदा ने उन्हें अपना पति समझकर उनका स्वागत किया और पूजा की। जैसे ही उन्होंने जालंधर रूपी विष्णु को अपने पति के रूप में स्वीकार किया, उनकी पतिव्रता शक्ति समाप्त हो गई। उसी क्षण भगवान शिव ने जालंधर का वध कर दिया।
जब वृंदा को इस छल का पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित और दुखी हुईं। उन्होंने भगवान विष्णु को शाप दिया —
“हे विष्णु! आपने मेरे पतिव्रता धर्म का अपमान किया है, इसलिए आप पत्थर बन जाएँगे।”
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वृंदा के शाप से भगवान विष्णु शालिग्राम शिला बन गए। वृंदा ने अपने पति की मृत्यु और इस घटना के कारण प्राण त्याग दिए। उनके शरीर से एक पवित्र पौधा उत्पन्न हुआ — जिसे आज तुलसी के नाम से जाना जाता है।
भगवान विष्णु ने तब आकाशवाणी की —
“हे वृंदा, तुम मेरे लिए अत्यंत प्रिय हो। युगों-युगों तक मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। इसलिए हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मैं तुम्हारे साथ विवाह करूँगा।”
तब से यह परंपरा चली आ रही है कि हर वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी-शालिग्राम विवाह मनाया जाता है। इस विवाह में देवी-देवताओं को साक्षी मानकर तुलसी माता का विवाह भगवान विष्णु (शालिग्राम) से संपन्न किया जाता है।
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🌿 कथा का धार्मिक संदेश:
तुलसी विवाह की कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति, निष्ठा और धर्म की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं। वृंदा का जीवन त्याग, भक्ति और सच्चे प्रेम का प्रतीक है, जबकि तुलसी विवाह भगवान विष्णु और भक्त के पवित्र मिलन का प्रतीक बन गया है।
तुलसी विवाह पूजा विधि (Tulsi Vivah Puja Vidhi)
1. व्रत आरंभ करें: प्रातः स्नान कर साफ वस्त्र पहनें और संकल्प लें।
2. तुलसी चौरा सजाएँ: तुलसी के पौधे को गंगाजल से धोकर सुंदर चौरा बनाएं और हल्दी-कुमकुम से सजाएँ।
3. शालिग्राम जी की स्थापना करें: तुलसी के पास भगवान विष्णु (शालिग्राम) की मूर्ति रखें।
4. विवाह विधि करें:
तुलसी माता को वधू के रूप में सजाएँ (लाल साड़ी, बिंदी, चूड़ी, आभूषण आदि)।
शालिग्राम जी को वर के रूप में सजाएँ।
विवाह मंत्रों का उच्चारण करते हुए तुलसी-शालिग्राम का विवाह करें।
विवाह के बाद प्रसाद वितरित करें।
5. भोजन व दान: ब्राह्मणों और कन्याओं को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
तुलसी विवाह के लाभ (Benefits of Tulsi Vivah)
अविवाहित कन्याओं को योग्य जीवनसाथी मिलता है।
वैवाहिक जीवन में सौहार्द और प्रेम बढ़ता है।
घर में सुख-शांति, धन और समृद्धि आती है।
भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
तुलसी विवाह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह भक्ति, प्रेम और समर्पण का पर्व है। जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से तुलसी विवाह करता है, उसके जीवन में सभी प्रकार की बाधाएं दूर होकर, खुशियों और समृद्धि का वास होता है।
