Vaikunth Chaturdashi 2025: आखिर क्यों चढ़ाई जाती है वैकुंठ चतुर्दशी के दिन शिव जी को तुलसी मंजरी? जानें secret

वैकुंठ चतुर्दशी भगवान विष्णु और भगवान शिव के मिलन का अद्भुत पर्व माना जाता है। इस दिन शिव जी को तुलसी मंजरी अर्पित करने की परंपरा बहुत विशेष मानी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि तुलसी मंजरी चढ़ाने से भगवान हरि-हर दोनों की कृपा एक साथ प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और वैवाहिक आनंद बढ़ता है। आइए जानते हैं इस दिव्य परंपरा के पीछे छिपा वह रहस्य जिसे जानकर आप भी श्रद्धा से भर उठेंगे।

वैकुंठ चतुर्दशी

 

वैकुंठ चतुर्दशी हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और दुर्लभ पर्व है, जो कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव के “हरिहर मिलन” के रूप में जाना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु काशी (वाराणसी) में भगवान शिव की आराधना करते हैं और उन्हें तुलसी मंजरी अर्पित करते हैं। सामान्य दिनों में जहाँ भगवान शिव को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, वहीं वैकुंठ चतुर्दशी का दिन इस नियम का अपवाद है।

यह दिन भक्ति, क्षमा और एकता का प्रतीक है। इस तिथि पर भगवान विष्णु और शिव दोनों की आराधना करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति, मन की शांति, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Vaikunth Chaturdashi 2025: शिव जी को तुलसी मंजरी चढ़ाने का रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार, दैत्यराज जलंधर का वध भगवान शिव ने किया था। जलंधर की पत्नी वृंदा (तुलसी) एक अत्यंत पतिव्रता नारी थीं, और उनके पतिव्रत बल से जलंधर को अजेयता प्राप्त थी।
विष्णु भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए जलंधर का वध संभव कराने हेतु एक दिव्य लीला रची।
जब वृंदा को इस छल का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने विष्णु जी को शाप दिया कि वे पत्थर बन जाएँ। उसी शाप से विष्णु शालिग्राम रूप में प्रकट हुए और वृंदा तुलसी के रूप में पृथ्वी पर आईं।

वैकुंठ चतुर्दशी

तब से तुलसी और शालिग्राम (विष्णु) का विवाह हर साल देवउठनी एकादशी के दिन किया जाता है।
और जब वैकुंठ चतुर्दशी आती है, तब भगवान विष्णु तुलसी मंजरी लेकर भगवान शिव को अर्पित करते हैं
जो यह संदेश देता है कि द्वेष समाप्त होने पर भी प्रेम और एकता बनी रहती है।

इसीलिए वैकुंठ चतुर्दशी के दिन शिव जी को तुलसी मंजरी चढ़ाना न केवल धार्मिक दृष्टि से पवित्र है, बल्कि यह क्षमा, प्रेम और एकत्व का प्रतीक भी है।

कहा जाता है कि जो भक्त इस दिन श्रद्धा से तुलसी मंजरी अर्पित करता है, उसके जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है, और सकारात्मक ऊर्जा, धन-लक्ष्मी और भगवान हरि-हर का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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Vaikunth Chaturdashi 2025: वैकुंठ चतुर्दशी की पूजा विधि (Puja Vidhi)

वैकुंठ चतुर्दशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यह दिन भगवान शिव और विष्णु दोनों की संयुक्त आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। पूजा विधि इस प्रकार है —

  1. सबसे पहले घर के मंदिर में भगवान शिव और भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

  2. शुद्ध जल, गंगाजल और पंचामृत से दोनों की प्रतिमाओं का स्नान करें।

  3. भगवान विष्णु को तुलसी मंजरी, पीले फूल, पंचामृत, शंख और दीप अर्पित करें।

  4. भगवान शिव को बिल्वपत्र, धतूरा, भस्म, दूध और शहद से पूजा करें।

  5. इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव को तुलसी मंजरी चढ़ाई जाती है — जो हरिहर एकता का प्रतीक है।

  6. पूजा के समय “ॐ नमः शिवाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्रों का जाप करें।

  7. रात्रि में दीपदान करें और गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष फल मिलता है।

Vaikunth Chaturdashi 2025: वैकुंठ चतुर्दशी के लाभ (Benefits)

वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत और पूजा करने से भक्त को अनेक प्रकार के आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ मिलते हैं —

✨ इस दिन पूजा करने से मन, घर और जीवन से नकारात्मकता दूर होती है।
✨ भगवान विष्णु और शिव दोनों की कृपा से धन, समृद्धि और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है।
✨ यह व्रत पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
✨ तुलसी मंजरी चढ़ाने से आध्यात्मिक शक्ति, शांति और सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
✨ जो व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से शिव-विष्णु की पूजा करता है, उसके सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में Positive Energy आती है।

निष्कर्ष (Conclusion)

वैकुंठ चतुर्दशी न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह हर और हरि के मिलन का प्रतीक भी है —
जहाँ द्वेष, भ्रम और नकारात्मकता समाप्त होकर प्रेम और एकता की भावना जागृत होती है।
इस दिन श्रद्धापूर्वक तुलसी मंजरी चढ़ाने से जीवन में संतुलन, समृद्धि और परम शांति प्राप्त होती है।

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